कृषि क़ानूनों ( New Agriculture Law in India) को वापस लेना मोदी सरकार( Modi Government will quess) का मास्टर स्ट्रोक या मजबूरी( Master strock Of Modi Or Under Pressure)?

खबरदार ब्यूरो


मोदी सरकार( Modi Government will quess) का मास्टर स्ट्रोक या मजबूरी( Master strock Of Modi Or Under Pressure)?

मोदी सरकार ने नए कृषि क़ानून वापस लेने का फैसला लिया है. इसकी टाइमिंग की चर्चा खूब हो रही है. कुछ दिन बाद संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने वाला है. 26 नवंबर को किसान आंदोलन के एक साल पूरे होने पर किसानों ने आंदोलन को और तेज़ करने की घोषणा पहले से की हुई है.

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पाँच राज्यों में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले है, जिनमें उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा राज्य है. जहाँ हाल ही में बीजेपी के चाणक्य कहे जाने वाले गृह मंत्री अमित शाह को पश्चिम उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी गई है. सोशल मीडिया पर इसके साथ ही ‘मास्टर स्ट्रोक’ ट्रेंड कर रहा है जिनमें दावा किया जा रहा है कि ये फ़ैसला एक मास्टर स्ट्रोक है,ना कि मजबूरी लेकिन ये फैसला लेने में कई और फैक्टर भी थे जिनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है

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पंजाब में बिना कैप्टेन और अकाली के बीजेपी की झोली अभी भी रहेगी खाली

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चंड़ीगढ़ में प्रो संजय कुमार सेंटर फोर सोशल स्टडीज के मुताबिक लम्बे अरसे से बीजेपी के साथ रहे अकाली दल ने किसान आंदोलन को लेकर ही बीजेपी से गठबंधन तोड़ा था इसका मतलब कृषि कानून वापस लेकर भी पंजाब में बीजेपी के हाथ कुछ खास हाथ नहीं लगने वाला है जबतक

कैप्टन अमरेंन्द्र सिंह और अकाली का बीजेपी के साथ ये बंधन नहीं होता है, हां अगर तीनों ही दलों का गठबंधन हो जाता है तो फिर पंजाब से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाएगा टीम मोदी की पूरी की पूरी कोशिश होगी कि आगामी पंजाब चुनाव से पहले कैप्टेंन और अकाली के साथ पैक्ट हो जाए और इसकी अब संभावना भी ज्यादा है वैसे भी बिना गठबंधन के पंजाब में बीजेपी कुछ खास नहीं कर पायेगी ये टीम मोदी बेहतर जानती है फीसदी वोट इस गठबंधन की झोली में जा सकते हैं

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मोदी सरकार कभी झुकती नहीं है, लेकिन इस बार झुक गई सरकार

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कृषि कानून वापस लेकर मोदी सरकार ने ये संदेश दे दिया है कि वो अपने फैसलों पर झुक सकती है इससे पहले इस सरकार की इमेज थी कि कुछ भी हो जाए लेकिन फैसला वापस नहीं होगा लेकिन इस बार फैसला वापस लेकर मोदी ने ये जता दिया है कि वो दबाव में हैं इसीलिए ये फैसला वापस लिया गया है चाहे इसे चुनाव की मजबूरी से जोड़ा जाय या कुछ और लेकिन सरकार इस बार झुकी जरूर है इससे पहले सरकार ने भूमि अधिग्रहण के मुददे पर भी यू टर्न लिया था इसके अलावा जीएसटी के मसले पर भी सरकार राज्यों के आगे झुकी थी और उनको जीएसटी में ह्स्सेदारी दी गई थी, कहा तो यहां तक जाता है कि बीजेपी चुनावी हार से डरती है इसीलिए महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की हार से मोदी सरकार बैक फुट पर हैइसके अलावा हाल के उपचुनाव में भी बीजेपी खास कुछ नहीं कर पाई थी इसीलिए ये फैसले वापस लेने की नौबत आई थी इसके अलावा यूपी के आगामी चुनाव में करीब 170 सीटों पर किसान आंदोलन का असर पड़ना तय माना जा रहा है

 

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कृषि कानून वापस लेने में यूपी का जातिगत गणित भी रहा खास

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यूपी का जातिगत गणित भी कृषि कानूनों को वापस लेने में अहम कड़ी रहा है सब जानते हैं कि यूपी में सीएसडीएस के आंकड़ो के मुताबिक यूपी में सामान्य जाति 18 फीसदी, मुस्लिम 32 फीसदी, दलित 18 फीसदी,जाट 12 फीसदी, ओबीसी 30 फीसदी हैं और पूरे यूपी में 70 फीसदी किसान हैं इन कानूनों को वापस लेने से 12 फीसदी जाट वोट बीजेपी के पाले में आ सकते हैं इसके अलावा 70 फीसदी किसानों पर भी कानून वापस लेने का सकारात्मक असर पड़ेगा इसीलिए इन कानूनों को वापस लेना आगामी चुनाव के लिहाज से मोदी सरकार  मास्ट्र स्ट्रोक के तौर पर देखा जा रहा है अब विपक्ष के पास सरकार की खिलापत करने के लिए मुद्दे भी नहीं हैं इसीलिए सभी विपक्षी दल इन फैसलों को वापस लेने में अपनी अपनी जीत करार दे रहे है और किसान नेताओं ने अपना आंदोलन अभी भी रद्द नहीं किया है वो जानते हैं कि जिस दिन वो ये दिखा देंगे कि सरकार के फैसले से वो खुश हैं तो इसका श्रेय केवल और केवल मोदी सरकार को जाएगा इसीलिए उनकी घोषणा है कि शीतकालीन सत्र तक वो डटे रहेगे यानि कि वो चाहते हैं कि किसानों को दिखाया जाय कि सरकार ने कुछ खास नहीं किया जबकि सब जानते हैं कि ये आंदलोन इन्हीं तीन कानूनों को वापस लेने के लिए हुआ था और किसान नेताओं ने मीडिया से बात करते हुए बार बार बोला था कि तों कानून वापस हो जायेगे तो वो आंदोलन वापस ले लेगें अब सब जानते हैं कि देश का पीएम अगर देश को संबोधित करके घोषणा कर रहा है कि कानून वापस होगें तो वो कोरी घोषणा तो हो नहीं सकती लेकिन कहा जाता है कि राजनीति में सब जायज है, इसीलिए फेस सेबिग के लिए किसान नेता अभी भी डटे हुए हैं

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मोदी सरकार( Modi Government will quess) का मास्टर स्ट्रोक या मजबूरी( Master strock Of Modi Or Under Pressure)?

इतना तो तय है कि मोदी दूर की सोचते हैं और वोट वैंक की भी सोचते हैं वो अच्छी तरह जानते हैं कि बिना सरकार के आप कुछ नहीं कर सकते सत्ता रहती है तभी कुछ किया जा सकता है इसलिए मोदी लोकलुभावन फैसलों के लिए जाने जाते हैं इस बार भी उन्होंने वही किया जो जनता चाहती थी भले कानूनों कोई खास दिक्कत ना रही हो लेकिन अगर जनता इस कानून को नहीं चाहती है तो मोदी ने उसको वापस ले लिया अपनी नाक का सवाल नहीं बनाया

 

 

 

 

 

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