नहीं रहे राजा साहिब

खबरदार ब्यूरो

हिमांचल( Himachal Pradesh) प्रदेश में राजा साहिब के नाम से मशहूर प्रदेश के छह बार के मुख्यमंत्री( CM Himanchal) और पूर्व केंद्रीय मंत्री( Central minister) रहे वीरभद्र सिंह का आज तड़के निधन हो गया है। 10 जुलाई शनिवार को पदम पैलेस रामपुर में शाम तीन बजे उनका अंतिम संस्कार होगा। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन के बाद हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्रदेश में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है।

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राजा साहिब के नाम से मशहूर, वीरभद्र सिंह का हुआ निधन

छह बार के मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे हैं वीरभद्र सिंह

10 जुलाई शनिवार को पदम पैलेस रामपुर में होगा अंतिम संस्कार ।

दोबारा कोरोना पॉजिटिव आने से आईजीएमसी अस्पताल में चल रहा था इलाज

वरिष्ठ कांग्रेस नेता के निधन से प्रदेशभर में शोक की लहर है

वीरभद्र सिंह को राजनीति में पंडित जवाहर लाल नेहरू लेकर आए थे

वीरभद्र सिंह का जन्म 23 जून, 1934 को राजा पदम सिंह के घर में हुआ

लोकसभा के लिए वह पहली बार 1962 में चुने गए

पहली बार 1983 में  राज्य के मुख्यमंत्री बने

 जानकारी के मुताबिक वीरभद्र का निधन सुबह करीब 3 बजकर 40 मिनट पर हुआ। 10 जुलाई शनिवार को पदम पैलेस रामपुर में सुबह आठ से दोपहर दो बजे तक पार्थिव शरीर दर्शन के लिए रखा जाएगा। शाम तीन बजे रामपुर में ही उनका अंतिम संस्कार होगा।  दोबारा कोरोना पॉजिटिव आने के बाद से वो शिमला के आईजीएमसी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। वरिष्ठ कांग्रेस नेता के निधन से प्रदेशभर में शोक की लहर है। वो करीब ढाई महीने से आईजीएमसी में दाखिल थे। सोमवार को अचानक तबीयत खराब होने के बाद डॉक्टरों ने उन्हें वेंटिलेटर पर दाखिल कर दिया था। इसके बाद से वह बेहोशी की हालत में यहां पर उपचाराधीन थेलेकिन गुरुवार सुबह उनकी मौत हो गई। वह 87 साल के थे। हिमाचल प्रदेश के छह बार मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र सिंह को राजनीति में पंडित जवाहर लाल नेहरू लेकर आए थे। इस बात को वो कई बार दोहराते थे। कई राजनीतिक मंचों से भी उन्होंने इस बात का जिक्र किया था। 

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हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का अंतिम संस्कार 10 जुलाई को रामपुर में होगा। इससे पहले आज गुरुवार को पार्थिव शरीर दिनभर होलीलॉज में दर्शन के लिए रखा जाएगा। 9 जुलाई शुक्रवार को पार्थिव शरीर सुबह नौ बजे से 11:30 बजे के बीच दर्शन के लिए रिज मैदान पर आम लोगों के बीच रखा जाएगा। उसके बाद पार्थिव शरीर एक बजे तक राजीव भवन कांग्रेस में दर्शन के लिए रखा जाएगा। दोपहर एक बजे पार्थिव शरीर को लेकर परिवार रामपुर के लिए रवाना होगा। शाम छह बजे पार्थिव शरीर को लेकर परिवार रामपुर पहुंचेगा।

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आईजीएमसी के एमएस डॉ. जनक राज ने उनकी मौत की पुष्टि की है। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन के बाद हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्रदेश में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है। इन तीन दिनों के दौरान प्रदेश में कोई भी बड़े आयोजन  नहीं होंगे।

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के निधन के बाद प्रदेश सरकार ने तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है। शोक के दौरान प्रदेश में कोई सरकारी मनोरंजन संबंधी कार्यक्रम नहीं होंगे। प्रदेश के सरकारी दफ्तर खुले रहेंगे।

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वर्तमान में वीरभद्र अर्की से विधायक थे। वे केंद्र सरकार में भी अपनी सेवाएं दे चुके थे। उनके पास केंद्रीय इस्पात मंत्रालय रहा और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग मंत्रालय भी वे संभाल चुके थे।

वीरभद्र सिंह का जन्म 23 जून, 1934 को बुशहर रियासत के राजा पदम सिंह के घर में हुआ। लोकसभा के लिए वह पहली बार 1962 में चुने गए। उसके बाद 1967, 1971, 1980 और 2009 में भी चुने गए। वीरभद्र वर्ष 1983 से 1990, 1993 से 1998, 1998 में कुछ दिन तक तीसरी बार, फिर 2003 से 2007 और 2012 से 2017 में हिमाचल के मुख्यमंत्री रहे

कांग्रेस की पुरानी पीढ़ी से नाता रखने वाले राजा साहिब ने 27 साल की उम्र में 1962 में लोकसभा चुनाव से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी। उन्होंने चार बार संसद सदस्य के रूप में अपनी सेवाएं दी थी। 

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 राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में उनका पहला कार्यकाल 1983 में शुरू हुआ था और 1990 तक लगातार दो बार वो इस पद पर बने रहे। केंद्रीय राजनीति में अनुभवी, वीरभद्र सिंह 5 बार सांसद और 6 बार सीएम रहे थे। उन्होंने बखूबी राज्य का नेतृत्व किया और पर्यटन के विकास के अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे के निर्माण में भी सक्रिय भूमिका निभाई। राजा साहिब इतने खासे लोकप्रिय नेता थे कि वो 1985, 1993, 2003 और 2012 में फिर से मुख्यमंत्री चुने गए। साल 1976-77 में केन्द्र सरकार में पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्री बने थे। उन्होंने 2009 में लोकसभा चुनाव जीता और केंद्रीय इस्पात मंत्री और बाद में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्धोग मंत्री के रूप में काम किया।

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राजा वीरभद्र के जीवन की खास बात ये रहीं कि वो अपने रास्ते में आई लगभग हर परेशानी से बचते गए, जिसमें भ्रष्टाचार के आरोप और पार्टी के भीतर प्रभाव कम होना भी शामिल था। उन्होंने पार्टी के कई प्रतिद्वंद्वियों की धमकियों का मुकाबला किया।

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90 के दशक की शुरुआत में, कांग्रेस के दिग्गज नेता सुख राम ने उनके लिए एक विकट चुनौती पेश की। 1993 में कांग्रेस ने 68 विधानसभा सीटों में से 52 पर जीत हासिल की थी। सुख राम, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के करीबी थे। वह  मुख्यमंत्री बनने के इच्छा रखते थे। सुख राम को 22 विधायकों का समर्थन प्राप्त था। लेकिन वीरभद्र, जो अपने राजनीतिक कौशल के लिए जाने जाते थेउन्होंने सत्ता पर दावा करने के लिए पांच निर्दलीय विधायकों के साथ 29 विधायकों का समर्थन हासिल किया। जिसके बाद कांग्रेस आलाकमान की तरफ से भेजे गए तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह दोबारा विचार करने पर मजबूर हुए। टेलीकॉम घोटाले में सुखराम का नाम आने के बाद वीरभद्र ने फिर से पैर जमाए।

Author: admin

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