Sunday, May 9, 2021
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नहीं रहे “दादा”

रिर्पोट- आर सी ढौंड़ियाल

1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई तो उन्हें प्रधानमंत्री की रेस में सबसे आगे माना गया। 20 साल बाद एक बार फिर उनके हाथ से प्रधानमंत्री बनने का मौका निकल गया। इसके बावजूद वह देश की सबसे ऊंची संवैधानिक कुर्सी तक पहुंचने में कामयाब रहे। हम बात कर रहे हैं पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की। 4 साल पहले उनकी आत्मकथा द टरबुलेंट इयर्स: 1980-1996 का विमोचन हुआ था। इसमें उन्होंने कई बड़े राजनैतिक घटनाक्रमों पर प्रकाश डाला था। इन्हीं में से एक था उनका कांग्रेस पार्टी से बाहर होना। आइए जानते हैं कुछ दिलचस्प किस्से:

27 अप्रैल 1986। यही वह तारीख थी जब राजीव गांधी ने प्रणब मुखर्जी को अपनी कैबिनेट के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी से भी रुखसत कर दिया। दिल्ली में 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी ने अनमने ढंग से सियासत में एंट्री की थी। वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह ने प्रणब मुखर्जी से जुड़े एक दिलचस्प वाकए का जिक्र किया।

प्रणब मुखर्जी ने 2012 से 2017 तक राष्ट्रपति का पद संभाला

इंदिरा गांधी सरकार में प्रणब मुखर्जी की नंबर 2 की हैसियत थी

राजीव गांधी की सरकार में प्रणब मुखर्जी का कद घट गया था

अपनी आत्मकथा में प्रणब मुखर्जी ने कई दिलचस्प वाकए बताए

दादा बोले- तकलीफ तो होती है…

वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह ने बतातें हैं कि, ‘जनवरी 1985 में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने थे। उनके पीएम बनने में ज्ञानी जैल सिंह ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। दस साल पहले की बात है। उस वक्त प्रणब मुखर्जी रक्षा मंत्री थे। एक बार प्रणब मुखर्जी से मैंने पूछा कि दादा आपके दफ्तर के बाईं तरफ प्रधानमंत्री की कुर्सी थोड़ी दूर है। कभी दर्द नहीं होता था कि यह कुर्सी आपके हाथ से फिसल गई। कैमरा ऑन था…दादा एकदम हवा में चुपचाप आधा मिनट कुछ बोले नहीं। भावशून्य होकर देखते रहे। कहा- इट हर्ट्स..यानी तकलीफ तो होती है। प्रणब मुखर्जी को ये सब देखना पड़ा।

इंदिरा सरकार में नंबर 2 की हैसियत थी

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दो बार गोरखपुर से सांसद रह चुके हरिकेश बहादुर ने इंदिरा गांधी की कैबिनेट में प्रणब मुखर्जी नंबर दो की हैसियत में थे। वेंकटरमण और नरसिंह राव जैसे लोगों के कैबिनेट में होने के बावजूद जब कभी भी इंदिराजी बाहर होती थीं तो कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता वही करते थे। प्रणब मुखर्जी को कांग्रेस से बाहर होना पड़ा लेकिन राजीव गांधी के समय में ही उनकी पार्टी में वापसी हो गई थी।

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