Sunday, May 9, 2021
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उत्तराखंड में बेलगाम नौकरशाही

उत्तराखंड में बेलगाम नौकरशाही

उत्तराखंड में नौकरशाही की मनमानी का शिकार अब प्रदेश के मंत्री भी होने लगे हैं… इस बार वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक अदिकारिय़ों की बेलगाम रवैय्ये का शिकार हुए हैं…मुख्यमंत्री के बाद सबसे ताकतवर समझे जाने वाले कौशिक की अहमियत इससे समझी जा सकती है कि उनको सरकार के प्रवक्ता का जिम्मा भी दिया गया है। एक तरह से सरकार का चेहरा माने जाने वाले वरिष्ठ मंत्री के साथ सरकारी अफसरों के गैरजिम्दार रवैये से नाराज खुद  मुख्यमंत्री ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया है।

उत्तराखंड में कैबिनेट मंत्री के साथ अधिकारी कैसा सलूक करते हैं ये किसी से छिपा नहीं है फिलहाल उत्तराखंड में बेलगाम नौकरशाही  की नकेल कसने के लिए कोई उपाय नही है सरकार के सख्त निर्देशों के बाबजूद भी अभी तक अधिकारियों की मनमर्जी पर सूबे में लगाम नहीं लग पाई है उत्तराखंड  को अलग राज्य बने 20 साल होने जा रहे हैं। इस दौरान नौ मुख्यमंत्रियों ने सत्ता संभाली, लेकिन कोई भी मुखिया यहाँ की नौकरशाही को पूरी तरह साधने में कामयाब नहीं हो पाया । सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो, या भाजपा की, अफसरों के व्यवहार से तंग आकर विधायकों और मंत्रियों ने सार्वजनिक मंचों पर अपनी व्यथा जाहिर करने से गुरेज नहीं किया। इसी सरकार की बात की जाए तो वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत से लेकर यशपाल आर्य, सतपाल महाराज, अरविंद पांडेय और राज्य मंत्री रेखा आर्य तक कई मौकों पर अफसरों की कार्यशैली और मंत्रियों के साथ उनके रवैये पर तल्ख टिप्पणी कर चुके हैं। जब मंत्रियों की ये हालत है तो विधायकों की  तो फिर क्या बात की जाए।  हाल ही में भाजपा के किच्छा से विधायक राजेश शुक्ला ने विधानसभा अध्यक्ष को ऊधमसिंह नगर के  डी एम के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की सूचना दी है। आपको बता दें कि ये सब कुछ  उसके बाद हो रहा है जबकि हाल ही में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सूबे की नौकरशाही पर तल्ख टिप्पणी की थी। तीन जुलाई को मुख्यमंत्री ने कहा था कि जनप्रतिनिधियों का औधा अधिकारियों से ऊपर है। इस सबके बावजूद मुख्यमंत्री की नसीहत को एक महीना भी नहीं गुजरा और सरकार में कददावर कैबिनेट मंत्री को अफसरों की निरंकुश कार्यशैली से रूबरू होना पड़ा है। हालांकि मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचने के बाद मुख्य सचिव ने सभी अपर मुख्य सचिवों, प्रमुख सचिवों, सचिवों और अपर सचिवों को मंत्रियों की बैठकों में हाजिर रहने के निर्देश दे दिए हैं। अब सबकी नजरें इस  बात पर टिकी हैं कि अफसरशाही पर लगाम लगाने के लिए निर्देशों के अलावा भी सरकार कोई और दूसरे सख्त उपाय तलाशेगी या नहीं।उत्तराखंड में निरंकुश नौकरशाही के किस्से अक्कसर सुर्खियों में रहते हैं लेकिन 20 साल बाद भी अगर सूबे की नौकरशाही बेलगाम है तो इसके जिम्मेदार खुद सूबे का राजनीतिक नेतृत्व ही है क्योंकि अगर राजा को राज करना नही आयेगा तो मुलाजिम राजकाज चलाना शुरू करीगे ही…. ये कहीं ना कही इस सूबे के लिए गंम्भीर हालात पैदा कर रहे हैं ….

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