इसीलिए वो थे…. “अटल “

आर सी ढौंडियाल

वो जनवरी 1977 की एक कंपकपाती शाम थी, और जगह थी दिल्ली का रामलीला मैदान उस दिन इसी मैदान में विपक्षी नेताओं की एक रैली थी. रैली यूँ तो शाम 4 बजे से ही शुरू हो गई थी, लेकिन भाषण के लिए अटल बिहारी बाजपेयी की बारी आते-आते रात के साढ़े नौ  से ज्यादा का वक्त हो चुका था. जैसे ही वाजपेयी बोलने के लिए खड़े हुए तो वहाँ मौजूद हज़ारों लोग भी खड़े हो कर ताली बजाने लगे थे

अचानक अटल जी ने अपने दोनों हाथ उठा कर लोगों की तालियों को शाँत किया और अपनी आँखें बंद कर दी और फित एक कविता की एक लाइन पढ़ी, ”बड़ी मुद्दत के बाद मिले हैं दीवाने….वाजपेयी थोड़ा ठिठके. लोग आपे से बाहर हो रहे थे.  अटल जी ने फिर अपनी आंखें बंद कीं. और फिर एक लंबा पॉज़ लिया और कविता के मिसरे को पूरा किया, ….कहने सुनने को बहुत हैं अफ़साने.

इस बार तालियों का दौर और लंबा चला था. जब शोर रुका तो वाजपेयी ने एक और लंबा पॉज़ लिया और दो और लाइनों को पढ़ां……खुली हवा में ज़रा सांस तो ले लें, कब तक रहेगी आज़ादी कौन जाने?”

उस जनसभा में शामिल रहे कई लोग बताते हैं कि ”ये शायद ‘विंटेज अटल’ का सर्वश्रेष्ठ रूप था. हज़ारों हज़ार लोग कड़कड़ाती सर्दी और बूंदाबांदी के बीच अटल जी को सुनने के लिए जमा हुए थे. इसके बावजूद कि उस वक्त की इंदिरा सरकार ने उन्हें रैली में जाने से रोकने के लिए उस दिन दूरदर्शन पर 1973 की सुपर हिट फ़िल्म ‘बॉबी’ दिखाने का निर्णय लिया था. लेकिन सरकार के इस फैसले का रैली कोई असर नहीं हुआ . बॉबी और वाजपेयी के बीच लोगों ने अटल को चुना. उस रात उन्होंने साबित कर दिया कि उन्हें यूँ ही भारतीय राजनीति का सर्वश्रेष्ठ वक्ता नहीं कहा जाता है.”

KHABARDAR Express...

और अटल का ये अंदाज भी था …. भले ही आज की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार इस वक्त पेट्रोल, डीज़ल के दामों में बढ़ोतरी को जायज ठहरा रही हो, लेकिन 44 साल पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसी मुद्दे पर इंदिरा गांधी की सरकार के ख़िलाफ़ हल्ला बोला था. अटल बिहारी वाजपेयी पेट्रोल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी के खिलाफ प्रदर्शन में खुद बैलगाड़ी से संसद भवन पहुंचे थे और अपना विरोध दर्ज कराया था.

    न्यूयॉर्क टाइम्स के 12 नंवबर, 1973 को प्रकाशित अंक के मुताबिक उस वक्त प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पेट्रोल और डीजल की बढती कीमतों की वजह से संसद में विरोधी दलों के गुस्से का सामना करना पड़ा था. अस दिन संसद में छह सप्ताह तक चलने वाले शीतकालीन सत्र की शुरुआत हुई थी. दक्षिण और वामपंथी पार्टियों ने बढ़ी हुई पेट्रोल, डीजल की बढती कीमतों को रोकने में  नाकामयाबी का आरोप लगाते हुए इंदिरा सरकार से इस्तीफ़े तक की मांग कर डाली थी. उस दिन जन संघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी और दो अन्य सदस्य बैलगाड़ी से संसद भवन पहुंचे थे. इनके अलावा कई दूसरे सांसद भी साइकिल से संसद आए थे. वे सभी देश में पेट्रोल और डीजल की कमी में इंदिरा गांधी का बग्घी से यात्रा करने का विरोध कर रहे थे. इंदिरा गांधी  उस दौर में दिनों को पेट्रोल बचाने का संदेश देने के लिए बग्घी से यात्रा कर रही थीं. उस दौरान तेल का उत्पादन करने वाले मध्य-पूर्व देशों ने भारत को निर्यात होने वाले पेट्रोलियम पदार्थों में कटौती कर दी थी. जिसके बाद इंदिरा गांधी की सरकार ने तेल की कीमतों में 80 फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी कर दी थी.

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